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शिक्षा में समानता की जरूरत — मेरा अनुभव

  • Writer: Samanta
    Samanta
  • 6 days ago
  • 4 min read

शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं 

मेरा नाम चारु है और मैं बच्चों के साथ काम करती हूँ। बच्चों के साथ काम करते हुए मैंने बहुत-सी ऐसी बातें देखी हैं, जिन्होंने मुझे यह समझाया कि शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं है। शिक्षा का वास्तविक अर्थ है हर बच्चे को सीखने, आगे बढ़ने और अपने सपनों को पूरा करने का समान अवसर देना। लेकिन आज भी हमारे समाज में बहुत से बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें ये अवसर आसानी से नहीं मिल पाते।

मैं आज भी अपने आसपास के समुदाय में देखती हूँ कि बहुत से बच्चे शिक्षा से जुड़ना चाहते हैं, सीखना चाहते हैं और स्कूल जाना चाहते हैं, लेकिन परिस्थितियाँ उन्हें पीछे रोक देती हैं। खासकर जिन बच्चों के साथ मैं काम करती हूँ, वे वन समुदाय से आते हैं। इन बच्चों के जीवन की परिस्थितियाँ अलग हैं। उनके परिवार रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष करते हैं और इसी बीच बच्चों की पढ़ाई कई बार पीछे छूट जाती है।

नामांकन तो हो जाता है, लेकिन सीखने तक पहुँचना कठिन होता है। 

कुछ समय पहले हमारे स्कूल में नए बच्चों का नामांकन हो रहा था। मैं बच्चों को ध्यान से देख रही थी। उनमें से कई बच्चे ऐसे थे, जो कभी आंगनवाड़ी भी नहीं गए थे और सीधे स्कूल में प्रवेश ले रहे थे। कुछ बच्चों को पेंसिल पकड़ना तक ठीक से नहीं आता था। कई बच्चे पहली बार स्कूल का माहौल देख रहे थे। कुछ बच्चे बहुत घबराए हुए थे, तो कुछ अपने बड़े भाई-बहनों का हाथ छोड़ने को तैयार नहीं थे। उस समय मुझे महसूस हुआ कि हर बच्चे की शुरुआत एक जैसी नहीं होती। कुछ बच्चे बहुत पीछे से अपनी यात्रा शुरू करते हैं।

धीरे-धीरे जब हम बच्चों और उनके परिवारों से जुड़े, तब हम उनकी परिस्थितियों को और करीब से समझ पाए। कई बच्चे ऐसे थे, जो नियमित रूप से स्कूल नहीं आ पाते थे। कुछ को घर में छोटे भाई-बहनों की देखभाल करनी पड़ती थी। कुछ बच्चों को परिवार के काम में हाथ बँटाना पड़ता था। कई बार माता-पिता सुबह काम पर चले जाते थे और छोटे बच्चों की ज़िम्मेदारी बड़े बच्चों पर आ जाती थी। ऐसे में पढ़ाई उनके लिए प्राथमिकता नहीं रह पाती, जबकि सीखने की इच्छा उन बच्चों में भी उतनी ही होती है।

लड़कियों की शिक्षा अभी भी एक चुनौती

मैंने कई बार यह भी देखा है कि कुछ परिवारों में आज भी लड़कों की पढ़ाई को अधिक महत्व दिया जाता है। लड़कियों से घर के काम और छोटे भाई-बहनों की देखभाल की अपेक्षा की जाती है। ऐसे में कई लड़कियाँ नियमित रूप से स्कूल नहीं आ पातीं। ज़रूरत है कि हम लड़का और लड़की दोनों को समान अवसर दें, ताकि हर बच्चा अपने सपने पूरे कर सके।

मुझे आज भी एक छोटी बच्ची याद है, जो पढ़ने में बहुत रुचि रखती थी। वह स्कूल आती तो बहुत खुशी से गतिविधियों में भाग लेती और जल्दी सीखने की कोशिश करती। लेकिन वह नियमित रूप से स्कूल नहीं आ पाती थी। जब हमने इसका कारण जानने की कोशिश की, तो पता चला कि उसकी माँ अक्सर नानी के घर चली जाती थीं या अन्य कामों में व्यस्त रहती थीं, और उसे घर पर अपने छोटे भाई की देखभाल करनी पड़ती थी। जब भी मैं उसके घर गई, मैंने उसे अपने छोटे भाई की देखभाल करते हुए ही पाया। उस बच्ची को देखकर मुझे बार-बार यही महसूस हुआ कि हमारे बच्चों में सीखने की क्षमता की कमी नहीं है, कमी है तो केवल अवसरों की।

वंचित समुदायों के बच्चों को समझने की ज़रूरत

एक एजुकेटर के रूप में यह बात मुझे हमेशा सोचने पर मजबूर करती है कि शिक्षा केवल स्कूल खोल देने से पूरी नहीं हो जाती। ज़रूरी यह भी है कि हर बच्चा स्कूल तक पहुँच पाए, नियमित रूप से उससे जुड़ा रहे और उसे ऐसा वातावरण मिले, जहाँ वह बिना डर और झिझक के सीख सके। कई बार बच्चों को केवल पढ़ाई नहीं, बल्कि भरोसे, प्रोत्साहन और समझ की ज़रूरत होती है।

मैंने यह भी महसूस किया है कि जब बच्चों को प्यार और सम्मान के साथ सिखाया जाता है, तो वे धीरे-धीरे खुलने लगते हैं। जो बच्चे शुरुआत में चुप रहते हैं, वही बच्चे बाद में सबसे आगे आकर कविता सुनाते हैं, कहानी सुनाते हैं और विभिन्न गतिविधियों में भाग लेते हैं। छोटे-छोटे प्रयास बच्चों के भीतर आत्मविश्वास पैदा करते हैं।

आज भी हमारे समाज में ऐसे कई बच्चे हैं, जो आर्थिक कठिनाइयों, सामाजिक परिस्थितियों या जागरूकता की कमी के कारण शिक्षा से दूर रह जाते हैं। विशेष रूप से वन समुदाय और वंचित समुदायों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए हमें और अधिक संवेदनशील होने की आवश्यकता है। केवल बच्चों का स्कूल में दाखिला कराना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें सीखने के लिए निरंतर सहयोग और प्रोत्साहन देना भी आवश्यक है।

Read aloud sessions library
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निष्कर्ष

मेरे लिए शिक्षा का मतलब केवल पढ़ाना नहीं है। शिक्षा का मतलब है हर बच्चे तक पहुँचना, उसकी परिस्थितियों को समझना और उसे यह विश्वास दिलाना कि वह भी सीख सकता है, आगे बढ़ सकता है और अपने सपने पूरे कर सकता है। जब तक समाज का हर बच्चा शिक्षा से समान रूप से नहीं जुड़ता, तब तक वास्तविक अर्थों में शिक्षा में समानता नहीं आ सकती।


By Charu

Samanta Team

 
 
 

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